आलोक तोमर को लोग जानते भी हैं और नहीं भी जानते. उनके वारे में वहुत सारे किस्से कहे जाते हैं, ज्यादातर सच और मामूली और कुछ कल्पित और खतरनाक. दो बार तिहाड़ जेल और कई बार विदेश हो आए आलोक तोमर ने भारत में काश्मीर से ले कर कालाहांडी के सच बता कर लोगों को स्तब्ध भी किया है तो दिल्ली के एक पुलिस अफसर से पंजा भिडा कर जेल भी गए हैं. वे दाऊद इब्राहीम से भी मिले हैं और रजनीश से भी. वे टी वी, अखबार, और इंटरनेट की पत्रकारिता करते हैं.

Sunday, May 18, 2008

उत्तराखंड में भी है एक कारगिल



आलोक तोमर
डेटलाइन इंडिया
गमशाली;भारत चीन सीमा;,18 मई- तिब्बत की आजादी और वहां चीनी दमन पूरी दूनिया की खबरो मेंं है लेकिन गमशाली और उसी के जैसे आस पास के सैकड़ो गावों की कहानी, उनकी दहशत और उनकी गुमनामी कभी खबर नहीं बनती। इन गांवों की सुरक्षा चीन के प्रकोप से भारत तिब्बत सीमा पुलिस करती है लेकिन सच यह है कि इन गावों के लोगों की भूमिका भी भारतीय सैनिकों से कम नहीं है। भोटिया जनजाति के लोगों की बहुलता वाले इन गावों के निवासिंयों के लिए चीनी सेनाओं की उपस्थिति भी उनकी जिन्दगी की तरह एक पूरा सच है। ये लोग साहस न दिखाएं तो चीन से बड़ी संख्या में घुसपैठ बड़े पैमाने पर हो सकती है और वही कहानी दोहराई जा सकती है जो लद्दाख इलाके के कारगिल में लगभग आठ साल पहले घटित हुई थी। अब लेकिन इन लोगों का साहस भी जवाब देने लगा है। वे भारत के नागरिक हैं और तेजी से विकसित हो रहे उत्तराखण्ड राज्य के हिस्से हैं। मगर जैसा कारगिल,द्रास,बटालिक और आसपास की सीमावर्ती बस्तियों में नही हो पा रहा वैसे ही विकास का कोई हिस्सा देश की सुरक्षा के लिए जरूरी इन उत्तराखण्ड के पहाड़ी इलाकों तक नहीं पहुंच पा रहा है। स्कूल एक इस गांव में भी है लेकिन सिर्फ कक्षा पांच तक। अस्पताल के नाम पर बीस पहाड़ी किलोमीटरों का दुर्गम सफर करके मलारी कस्बे तक जाना पड़ता है और वहां का अस्पताल भी कोई पूरी सुविधाओं से लैस नहीं है। बीमारियां या दुर्घटनाएं यहा मृत्यु का परिणाम बन कर आती हैं, जीवन की जरूरी सुविधाएं हैं नहीं, बर्फ साल में सिर्फ एक फसल होने देती है और इसी लिए अघोषित अकाल इलाके का चिर सत्य बन गया है। नतीजा स्वाभाविक तौर पर वही है जो हो सकता था। ज्यादातर गांवों के लोग अपने घर-आंगनों को वीरान छोड़ कर मैदानी इलाकों में बसने लगे हैं और उत्तराखण्ड की चीन सीमा भारत के लिए लगातार ज्यादा असुरक्षित होती जा रही है। राज्य सरकार को इन लोगों के अस्तित्व की कोई चिंता नही है। आंखे शायद तब खुलेंगी जब चीन खामोशी से भारत के एक और बड़े हिस्से पर कब्जा कर लेगा और फिर देहरादून के बस में तो कुछ रहेगा नहीं, दिल्ली से भी राजनयिक किस्म के बयान आते रहेंगे जिनका गमशाली और उसके आसपास के मासूम लोगों के लिए एक निर्वासन के अलावा र्कोई महत्व नहीं होगा। ं

1 comment:

Mired Mirage said...

पहाड़ का जीवन तो वैसे भी कठिनाई व अभाव का होता है । अब इसपर यह चीनी स्कट भी मंडरा रहा है जानकर चिंता व दुख हुआ।
घुघूती बासूती