आलोक तोमर को लोग जानते भी हैं और नहीं भी जानते. उनके वारे में वहुत सारे किस्से कहे जाते हैं, ज्यादातर सच और मामूली और कुछ कल्पित और खतरनाक. दो बार तिहाड़ जेल और कई बार विदेश हो आए आलोक तोमर ने भारत में काश्मीर से ले कर कालाहांडी के सच बता कर लोगों को स्तब्ध भी किया है तो दिल्ली के एक पुलिस अफसर से पंजा भिडा कर जेल भी गए हैं. वे दाऊद इब्राहीम से भी मिले हैं और रजनीश से भी. वे टी वी, अखबार, और इंटरनेट की पत्रकारिता करते हैं.

Friday, May 9, 2008

बच्चन जी का सच्चा स्मारक




आलोक तोमर

अमिताभ बच्चन ने अपने बाबू जी, हरिवंश राय बच्चन का स्मारक बनाने की घोषणा की है। कायदे से यह घोषणा देश में हिंदी के विकास के लिए काम कर रही दर्जनों संस्थाओं में से किसी को करनी चाहिए थी। उनके पास करोड़ो का बजट है जो ज्यादातर फूहड़ अनुवादों और बैठकों के यात्रा भत्ताों में खर्च होता है। आखिर कवि बच्चन का बेटा होने का सौभाग्य तो अमिताभ को ही मिला है लेकिन अगर आधुनिक हिंदी कविता की बात की जाए तो बच्चन रिश्ते में पूरी समकालीन हिंदी कविता के बाप लगते हैं। एक पूरी पीढ़ी है जिसने गोदान और मधुशाला पढ़ने के लिए बाकायदा हिंदी सीखी। आज कवि सम्मेलन बहुत बड़ा बाजार बन गए हैं लेकिन कवि बच्चन ने ही कवि सम्मेलनों में पारिश्रमिक लेने की परम्परा शुरू की थी।

मेरी विनम्र राय में कवि बच्चन का सबसे बड़ा स्मारक देश भर में बिखरा हुआ है और उसे संजोने की जरूरत है। यह स्मारक है बच्चन जी ध्दारा लिखे गए हजारों पत्र जो पूरे देश के शहरों और कस्बों में लोगों की फाइलों में लगे हुए हैं। बच्चन जी उन्हें लिखे गए हर पत्र का जवाब देते थे। गरीबी में थे तो पोस्ट कार्ड पर देते थे और जब चार पैसे जुड़ गए तो लैटर पैड पर बहुत कलात्मक लिखावट में संक्षिप्त ही सही, जवाब आते जरूर थे।

बात तब की है जब मैं चम्बल घाटी के एक छोटे से कस्बे भिंड में रहता था। बच्चन जी की आत्मकथा का पहला हिस्सा- क्या भूलूं, क्या याद करूं, प्रकाशित हो चुका था और अपने मन में भी कवि बनने की इच्छा जाग गई थी। तुकबंदियां करने लगा था और हिम्मत देखिए कि सीधे बच्चन जी को उनके प्रतीक्षा वाले पते पर भेजने लगा था। जवाब हर बार आता था और हमेशा शाबाशी का नही होता था फिर भी एक ध्वनि जरूर होती थी कि चलो कोई तो कविता लिख रहा है।

इस बीच लगा कि इलाहाबाद, जो साहित्य राजधानी थी, गए बगैर अपन साहित्यकार नही बन पाएंगें। सोलह साल की उम्र में वहां रहने वाली अपनी मौसी के घर जा कर बस गया। साईकिल चलाना सीखा, बच्चन जी ने जिन जगहों का वर्णन किया था जैसे कटघर, मुट्ठीगंज, सिविल लाइंस, एलफ्रेड पार्क की लाईब्रेरी- सब घुम डाली। नवाब यूसूफ रोड पर इलाचंद्र जोशी से मिला, लुकरगंज में महादेवी वर्मा के दर्शन किए, खुसरोबाग की सड़क पर नरेश मेहता के घर गया और उनके साहित्य पर तो निहाल था ही, उनकी बेटी पर भी मुग्ध हो गया।

इसी सड़क पर आगे उपेन्द्र नाथ अश्क एक बड़े सरकारी बंगले पर कब्जा किए बैठे थे। उनका उपन्यास निमिषा उन दिनों साप्ताहिक हिन्दुस्तान में धारावाहिक छप रहा था और मेरे जैसे किशोर को वे टॉलस्टाय नजर आने लगे थे। उन्होनें दर्शन दिए, नीबू पानी पिलाया और मेरे जैसे बच्चे से रहस्योद्धाटन करने के अंदाज में कहा कि अमिताभ बच्चन असम में इलाहाबाद विश्वविघालय के कुलपति रह चुके झा साहब के बेटे हैं। सबूत के तौर पर उन्होनें कहा कि बच्चन जी कितने छोटे कद के हैं और अमिताभ का कद कितना लंबा है। यही इस बात का सबूत है। इतने बड़े आदमी से इतनी छोटी बात सुन कर दिल को चोट लगी लेकिन वे जैसे भी थे अपने लिए उस समय गुनाहों के देवता थे इसलिए थके कदमों से साईकिल उठाई और वापस आ गया।

भिंड लौट कर बच्चन जी को एक पत्र में, जो शायद चार पेज का होगा, अश्क जी की बेहयाई के बारे में विस्तार से लिखा। आज्ञा भी मांगी कि अगर बच्चन जी कहें तो अपनी चंबल घाटी की शैली में अश्क जी को उनके खुसरो बाग में ठोक कर चला आऊं। तब तक इलाके की परम्परा के अनुसार देसी पिस्तौल चलाना सीख लिया था। पत्र का जवाब पंद्रह दिन बाद आया और वह भी पांच लाईन का। पहले आर्शीवाद अंत में शुभकामनाएं और बीच में सिर्फ यह कि मैनें लोगों का और उनके काम का आदर सीखा है और मुझे नही लगता कि मुझे अपनी आत्मा के अलावा और किसी को जवाब देना है। अश्क जी का तो उन्होनें कहीं नाम ही नही लिया। इसके बाद भी मैं कविताएं भेजता रहा, जवाब आते रहे। मधुशाला का सम्मोहन इतना था कि साथ पढ़ने वाली माधवी नाम की एक लड़की से एक तरफा प्रेम हो गया तो उसकी शान में, मधुशाला के छंद में ही, चौंसठ पन्ने की कॉपी में मधुबाला नाम की कृति लिख कर भेज दी। इस बार दो लाईन का जवाब आया। पहली लाईन थी कि तुम्हारी भाषा और छंद की समझ बढ़ती जा रही है और दूसरी लाईन में लिखा था कि हमेशा मौलिकता की ओर बढ़ो, नकल और अनुसरण की कोई मंजिल नही होती। फिर पत्रकार बना तो शीर्षकों ने कविता को पीछे धकेल दिया मगर मन का कवि मरने को तैयार नही था। उस जमाने की बम्बई में जनसत्ताा में नौकरी करने गया तो पहली कोशिश बच्चन जी से मिलने की थी जो अन्नू कपूर ने जया जी से कह कर पूरी करवाई। अब सारी कहानी कहने चला हूं तो यह भी बता दूं कि चौदह साल की उम्र में फिल्म गुव्ी देखी थी, जया जी पर फ़िदा हो गया था और दिल्ली से रैपीडेक्स का हिंदी बांग्ला कोर्स मंगा कर बांग्ला सीखनी शुरू कर दी थी। इस कहानी का अंत यही हुआ कि आखिरकार मैनें जया जी की तरह ही सुंदर एक बंगाली लड़की से शादी की और अब हमारी सोलह साल की एक बेटी है जिसे मैं बच्चन जी के बारे में सुनाया करता हूं। वह अभिषेक की फैन है और हम अमिताभ के लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है। यह पूरी कहानी इसलिए लिखी कि अमिताभ बच्चन अगर एक अपील कर दें तो पूरे देश से बच्चन जी की चिट्ठियों का अंबार निकल आएगा और वह उनका सच्चा स्मारक होगा।

कवियों, साहित्यकारों, आलोचकों, राजनेताओं और प्रसिध्द मित्रों को लिखे गए बच्चन जी के पत्र इधर-उधर प्रकाशित हुए हैं लेकिन जिन लोगों की असली पूंजी खुद गुमनाम होते हुए भी इतने बड़े साहित्यकार और उससे भी बड़े इंसान के एक दो या ज्यादा पत्र हैं, वे ही बच्चन जी का असली स्मारक हैं। कायदे से इंटरनेट की दुनिया में इनका अभिलेखागार बनना चाहिए और लोगों को प्रेरणा मिलनी चाहिए कि कितनी भी लंबी ई मेल एक छोटे से पोस्ट कार्ड की जगह नही ले सकती।

1 comment:

भुवनेश शर्मा said...

बहुत अच्‍छा लगा आपके संस्‍मरण पढ़कर. वाकई बच्‍चनजी एक कवि से ज्‍यादा बहुत प्रेरणादायी व्‍यक्तित्‍व हैं.

वैसे ये खाकसार भी आपकी चंबल घाटी(मुरैना) का ही है.