आलोक तोमर को लोग जानते भी हैं और नहीं भी जानते. उनके वारे में वहुत सारे किस्से कहे जाते हैं, ज्यादातर सच और मामूली और कुछ कल्पित और खतरनाक. दो बार तिहाड़ जेल और कई बार विदेश हो आए आलोक तोमर ने भारत में काश्मीर से ले कर कालाहांडी के सच बता कर लोगों को स्तब्ध भी किया है तो दिल्ली के एक पुलिस अफसर से पंजा भिडा कर जेल भी गए हैं. वे दाऊद इब्राहीम से भी मिले हैं और रजनीश से भी. वे टी वी, अखबार, और इंटरनेट की पत्रकारिता करते हैं.

Friday, April 18, 2008

राहुल गांधी को मोहरा बनाने की कोशिश





आलोक तोमर
अर्जुन सिंह पहले आदमी नही हैं जिन्होने राहुल गांधी को देश का भावी प्रधानमंत्री बनाने का ऐलान किया हो। इसके बहुत पहले अमेठी के जगदीश पीयूष और लखनऊ के जगदंबिका पाल भी यही मांग कर चुके थ। वैसे भी कांग्रेस में राहुल गांधी को युवराज कहने का चलन हो गया है और अर्जुन सिंह ने अगर युवराज को महाराज बनाने की मांग कर डाली तो कौन सा गुनाह कर दिया? वे बोले तो प्रणव मुखर्जी भी चुप क्यों रहते, उन्हें तो मनमोहन सिंह से वैसे भी पुराना हिसाब चुकाना था जब सोनिया गांधी ने प्रणव बाबू की पुरानी वफादारियों को भूलते हुए राजनीति का रा भी नही जानने वाले मनमोहन सिंह को देश का नेता घोषित कर दिया था।

यों तो अर्जुन सिंह और प्रणब मुखर्जी के रिश्ते राजनैतिक और निजी तौर पर बहुत मधुर नही हैं लेकिन जहां तक मनमोहन सिंह का सवाल है तो दोनों ही अपने-अपने कारणों से प्रधानमंत्री महोदय को खास पसंद नही करते। आप देख चुके हैं कि राहुल गांधी के राजतिलक वाले बयान को लेकर कितना हंगामा हुआ और कांग्रेस में लिफाफे पर गोंद की भूमिका निभाने वाली जयंती नटराजन को भी मौका मिल गया कि वे बडे नेताओं को उपदेश दे सकें। वह तो अर्जुन सिंह सीधे दस जनपथ पहुंच गए और उन्होने श्रीमती गांधी से साफ कह दिया कि वे उन नेताओं में से नही हैं जो अपने शब्द वापस लेते हैं। वैसे भी जब पत्रकारों ने उनसे राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बारे में पुछा था तो उन्होने सिर्फ इतना कहा था कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री क्यों नही बन सकते। इसके बाद कांग्रेस के महा प्रवक्ता वीरप्पा मोइली ने जल्दबाजी में पत्रकारों से कहा कि कांग्रेस की ओर से अपने किसी भी नेता को निशाना नही बनाया गया है और यह एक तरह का खुद को दिया गया अभय दान था।

कांग्रेस में वे लोग जो मनमोहन सिंह का वफादार होने का अब भी दावा कर रहें हैं और यह दावा उनके प्रधानमंत्री होने की वजह से है, का कहना है कि उनसे बडा विध्दान प्रधानमंत्री आज तक देश को मिला ही नही। यह लोग जवाहर लाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री का तो अपमान कर ही रहें हैं लेकिन पी वी नरसिंह राव को भुला रहे हैं जिन्हें ग्यारह भाषाएं आती थी और जो चंद्रास्वामी के आध्यात्मिक प्रभामंडल में बहुत भीतर तक शरीक थे। मनमोहन सिंह महान अर्थशास्त्री हैं इससे किसको ऐतराज हो सकता है लेकिन अगर अर्थशास्त्री होना ही प्रधानमंत्री होने की कसौटी है तो अपने अमर्त्य सेन ने किसी का क्या बिगाडा है। उन्हें तो अर्थशास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार भी मिल चुका है। रही मनमोहन सिंह ध्दारा लाई गई आर्थिक उदारवाद की बात तो इसका डंका पीटना कृपया बंद कर देना चाहिए। भारत अपने आप में इतनी बडी लेकिन बिखरी हुई आर्थिक महाशक्ति है कि दुनिया के बाजार में हमारे सिर्फ उतरने की देर थी। अमेरिका में तो यह बाजारवाद वहां के अर्थतंत्र का मूल सिध्दांत है और मनमोहन सिंह ने पूरी जिंदगी अमेरिका में विश्व बैंक से लेकर अंर्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष में नौकरियां की है और उन्हें पंचायती नही, कॉरपोरेट अर्थव्यवस्था ही समझ में आती है। इसी लिए अपने देश में ऐसा हो रहा है कि अंबानी कुटुंब दुनिया के सबसे बडे रहीशों में शामिल हो गया है और खुद मनमोहन सिंह जिस गांव के रहने वाले है उसकी ग्राम पंचायत के पास अपना भवन बनाने तक का पैसा नही है।

बात राहुल गांधी की हो रही थी। खुद उनकी माताश्री कह चुकी है कि राहुल की मंत्री बनने में कोई दिलचस्पी नही है और वे सिर्फ पार्टी का काम करना चाहते हैं। जाहिर है कि सोनिया गांधी अपने लाडले को प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार कर रही हैं और इसके लिए जरूरी प्रशासनिक अनुभव दिलवाने की तैयारी करना चाहती थी। राहुल गांधी ने मेहरबानी की जो अपनी मां से कह दिया कि वे मंत्री नही बनना चाहते। वैसे ही वे सुपर प्रधानमंत्री है इसलिए मंत्री और वह भी राज्य मंत्री बन कर वे क्या कर लेगें। राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन जाएं तो उसमें अपने को क्या ऐतराज होने वाला है? जब देवगौड़ा बन गए थे और इंद्रकुमार गुजराल बने थे तो किसी ने उनका क्या बिगाड लिया था? उनकी किस्मत उन्हें उठा कर लाई थी और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जब तक किस्मत में लिखा था तब तक के लिए बिठा कर चली गई थी। इन दोनों को देश ने कभी नही चुना था। इससे ज्यादा तो प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी गुलजारी लाल नंदा की थी जो तीन बार देश के कार्यवाहक प्रधानमंत्री रह चुके थे और इसके बावजूद दिल्ली की डिफेंस कॉलोनी की जिस बरसाती में वे किराए पर रहते थे वहां से मकान मालिक ने उनका सामान उठा कर फेंक दिया था और इलाके के थाने में इस घटना की रपट भी नही लिखी थी।

विरासत और वंश का जहां तक सवाल है तो हम राहुल गांधी को ही निशाने पर लेकर क्यों चलते हैं? खुद अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह मध्य प्रदेश में मंत्री रह चुके हैं और इस समय कांग्रेस की ताकतवर चुनाव अभियान समिति के मुखिया है वे अगर श्री सिंह के बेटे नही होते तो क्या उन्हें यह सम्मान और पद नसीब होता? प्रणब मुखर्जी के बारे में तो ये कहा जा सकता है कि उन्होने अपनी किसी संतान को राजनीति में नही उतारा। उनके बेटों और बडी बेटी का तो नाम भी किसी को नही पता। छोटी बेटी शास्त्रीय नृत्य में अपनी मेहनत से नाम कर चुकी है और पूरी दुनिया में घूमती रही है। हमारे देश का समाज अब भी मानसिकता के लिहाज से नेता नही, नायक या राजा खोजता है। हाल के वर्षो में दलित चेतना का जिस तरह उत्थान हुआ है उसे देखते हुए अब यह हालत बदलती जा रही है, लेकिन आप अगर गौर करें तो भारत में दलित चेतना का साक्षात प्रतीक मानी जाने वाली मायावती का रवैया क्या खुद किसी महारानी से कम है?

जैसे सबको यह आपत्तिा है कि राहुल गांधी को सिर्फ उनके राहुल गांधी होने के कारण प्रधानमंत्री नही बना देना चाहिए वैसे ही उन्हें अपने आप से सवाल करना चाहिए कि उनका नाम और वंश का नाम उनकी अयोग्यता क्यो साबित करना चाहिए? उनके पिता राजीव को इस देश ने असाधारण बहुमत देकर प्रधानमंत्री बनाया था लेकिन एक ही कार्यकाल के बाद कांग्रेस की हालत खराब हो गई और सच पुछिए तो अगले लोकसभा चुनाव में पार्टी की जो दशा हुई थी उसमें नरसिंह राव अगर झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को आर के आनंद और चंद्रास्वामी के तत्वाधान में मोटी रकम नही खिलाते और दुश्मन पार्टी के नेताओं को भी मंत्री का दर्जा नए-नए पद ग़ढ कर नही देते तो कांग्रेस की वह सरकार भी पुरे समय चलने वाली नही थी। इसी सरकार में प्रणब मुखर्जी का पूरा पुर्नवास हुआ था और अर्जुन सिंह को पार्टी से निकल कर अपनी एक कागजी पार्टी बनानी पडी थी और जल्दी ही वे वापस कांग्रेस में आ गए उनकी वापसी की भूमिका भी प्रणब मुखर्जी ने तैयार की थी। इन दोनों राजनैतिक महारथियों की इस ऐतिहासिक बैठक का एक गवाह मैं भी हुं। यह बैठक प्रणब मुखर्जी की सखी और तकनीकी तौर पर उस योजना आयोग में उनकी अफसर अमिता पॉल के घर हुई थी। यह अमिता पॉल दिल्ली के भूतपूर्व पुलिस कमिश्नर कृष्णकांत पॉल की पत्नी हैं और ये वही पॉल साहब हैं जिन्होनें बाद में अपने बेटे की पोल खुलने से दुखी हो कर किसी और बहाने से मुझे तिहाड जेल पहुंचा दिया था।

राहुल गांधी इस समय अपने पुज्य पिता की शैली में दुनिया को जानने और समझने का पूरा अभ्यास कर रहे हैं। वे गरीबों की झोपडी में सोते हैं और उन्हीं के साथ खाना खाते हैं। बहन मायावती का भरोसा करें तो इसके बाद वे दिल्ली आ कर अपने बाथरुम में किसी खास साबुन से नहाते भी हैं ताकि उनकी शुध्दि हो जाए। मायावती अगर इस साबुन का नाम भी घोषित कर देतीं तो कम्पनी का विज्ञापन का खर्चा बच जाता और हो सकता है यह पैसा पार्टी फंड में काम आ जाता। अब राहुल गांधी को इस साबुन का मॉडल बनने के बारे में विचार करना चाहिए। यह कहानियां तो आती जाती रहेगीं लेकिन असली सवाल राहुल गांधी की राजनैतिक पात्रता को ले कर किया जा रहा है और यह सवाल अपने आप में निपट आपत्तिाजनक है।

देश का प्रधानमंत्री मतदाता चुनते हैं और यह सवाल मतदाता की सामुदायिक बुध्दि पर संदेह करने जैसा है। हालांकि यह पुरानी बात हो गई मगर अब भी पुछा जा सकता है कि राजीव गांधी अगर अपनी मां ही हत्या के बाद चुनाव में नही उतरते तो भी क्या वैसा प्रचंड और ऐतिहासिक बहुमत ला पाते जैसा उनके नाम पर दर्ज है। युवा पीढी में अकेले राहुल नही है ज्योतिरादित्य सिंधिया भी है, मिलिंद देवडा भी हैं और सचिन पायलट भी हैं। पिछले मंत्रीमंडल विस्तार में बेचारे सचिन पायलट का नाम सिर्फ इसलिए कट गया क्योंकि वे कश्मीरी नेता फारुख अबदुला के दामाद भी हैं और फारुख अबदुला और सोनिया गांधी के बीच कोई खास घनिष्ठ रिश्ता नही चल रहा है, होने को ज्योतिरादित्य सिंधिया की बहन भी कश्मीर के महाराजा कर्ण सिंह के परिवार की बहु है और सिंधिया के जीजाजी कांग्रेस छोड़ कर चले गए हैं। लेकिन गनीमत है कि राजनीति का गुणा भाग करने वालों को यह तथ्य याद नही आया। या फिर मध्य प्रदेश की राजनीति में संतुलन बिठाने के लिए ग्वालियर के राज कुमार को मंत्री मंडल में जगह दी गई। ज्योतिरादित्य नाकाबिल नही है लेकिन उन्हें सिर्फ समीकरणों के कारण मंत्री बनाया गया है। अगर योग्यता के आधार पर बनाना होता तो कब का बना दिया गया होता। राहुल गांधी की शिखर की दावेदारी पर ऐतराज भी नही करना चाहिए और ना सिर्फ आनुवांशिक आरक्षण की तर्ज पर उन्हें सिर्फ इसलिए प्रधानमंत्री बनाने की बात की जानी चाहिए कि वे उस वंश के वारिस हैं जिसने देश को अब तक चार प्रधानमंत्री दिए हैं। (शब्दार्थ)

काठमांडू और रायपुर की दूरी

सुप्रिया रॉय

देश की सबसे बडी अदालत में छत्तीसग़ढ में माओवादियों से जूझने के लिए राज्य सरकार द्वारा शुरू किए गए सल्वा जोडुम अभियान की निंदा की है और कहा है कि आतंकवादियों से निपटने के लिए किसी राज्य सरकार को यह हक नहीं दिया जा सकता कि वह निजी सेनाएं ख़डी कर दें। अदालती फैसलों पर बहस करने में खतरा बहुत होता है लेकिन सब जानते हैं कि सल्वा जोडुम अभियान छत्तीसग़ढ के नागरिकों का एक प्रतिरोध मंच है और चूंकि यह भला और एक मात्र विकल्प है, इसलिए रमन सिंह सरकार ने भी अपने साधनों और संसाधनों का सहारा इसे दिया है।

जिन लोगों ने छत्तीसग़ढ देखा है और खासतौर पर उसके सुदूर, सुरम्य और दुर्गम जंगलों तक गए हैं वे जानते हैं कि इन वनों में रहने वाले वनवासी और आदिवासी कितने आतंकित और असहाय हो चुके हैं। अचानक आधुनिकतम हथियारों से लैस माओवादियों का एक जत्था वहां आता है और पहले धमकी की भाषा में बात करता है और फिर वनों की हरियाली में खून का लाल रंग बिखेर कर चला जाता है। जनता के लिए जनता द्वारा जनसंघर्ष के बहाने जनता के वघ यह सिलसिला आपत्तिजनक भी है और शर्मनाक भी।

छत्तीसग़ढ तो क्या किसी भी राज्य के पास कितनी पुलिस और हथियार बंद फौज नहीं होती कि वह हर घाटी और हर जंगल में निगरानी रख सके और रखवाली कर सके। इसके लिए जो एक विकल्प उपलब्ध था वह यही था कि आम लोगों का सशक्तीकरण किया जाए, उनके मन से भय निकाला जाए और उन्हें हथियारों का जवाब देने के लिए हथियारों का ही कवच दिया जाए। बस्तर इलाके में बहुत सारे गांव इन माओवादी गुंडो की वजह से वीरान हो चुके हैं और उनके लिए सरकारी शिविर बनाए तो गए हैं लेकिन शिविर की जिंदगी एक तरह से जेल की जिंदगी होती है और वक्त पर मिलने वाला खाना और सुरक्षा का आश्वासन किसी को उनके घर जैसी नैसर्गिकता और सहजता नहीं दे सकती। सरकारें भी कब तक इन शिविरों पर सिर्फ इस लिए खर्चा करतीं रहेंगी क्योंकि उनके पास लडाई के विकल्प नहीं हैं।

यह एक शुभ संयोग है कि खुद केंद्रीय गृह मंत्रालय में सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से असहमति जाहिर की है और कहा है कि सल्वा जोडुम के नाम से जो संगठन बनाया गया है उसे रणवीर सेना या भुजवाहिनी सेना की तरह जमीदारों की जातीय सेना से बराबरी पर नहीं देखा जाना चाहिए। छत्तीसग़ढ चूंकि असल में बहुत सारे प्रदेशों का रास्ता है और यह एक नया प्रदेश है इसलिए यहां संसाधन कम होने स्वाभाविक हैं। छत्तीसग़ढ के चारों ओर आंध्र प्रदेश झारखंड, बिहार और उडीसा हैं जहां माओवाद अपनी ज़डें जमा चुका है। खासतौर पर आंध्र प्रदेश में जब से माओवादियो पर वहां की पुलिस ने हंटर चलाया है तब से वे छत्तीसग़ढ के वनों में जमा होने लगे हैं।

माओवाद कोई भारतीय विचार नहीं है। ऐसा नहीं है कि भारत के समाज में सब कुछ शुभ ही शुभ हो रहा हो। यहां भी शोषण है, जातीयों के नाम पर होने वाले भेदभाव हैं, सरकारी बाबुओं से लेकर सरकार के शिखर तक बिखरा भ्रष्टाचार है, एक सामाजिक असहायता है लेकिन इस सबसे निजात पाने के लिए हम विचारों और हिंसा को क्या आयात होने देंगे। जिन माओवादियों को भारत में आदर्श बनाने के लिए एक महापुरूष नहीं मिला वे कैसे हमारे समाज का चेहरा बदलेंगे और उनके दिए गए आदर्शो से देश में समता मूलक व्यवस्था कायम हो जाएगी। भ्

भारत सरकार ने अपनी ओर से माओवाद को भारतीय संर्दभों में शतुत्रता के दायरे से निकालने की पूरी कोशिश की है। कम लोग जानते है कि नेपाल में माओवादियों को राजनीति की मुख्य धारा में शामिल करने और आखिरकार सरकार बनाने की हैसियत तक पहुंचने में भारत सरकार के दूतों ने काफी बडी भूमिका निभाई है। भारत के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री के कई दूत नेपाल में पडे रहे और आखिरकार 7 मार्च 2008 को एक राजनैतिक सहमति बनी जिसके तहत चुनाव हुए और बूढ़े और बीमार गिरिजा प्रसाद कोइराला के नेतृत्व को अस्वीकार करके वहां के मतदाता ने माओवादियों को उनके पुराने हिंसक पापों के बावजूद खुला समर्थन दिया। जाहिर है कि पिछले लगभग ढाई सौ साल से राजा को भगवान मानने वाली प्रजा को भी बदलाव का एक बहाना और अवसर चाहिए था। यह अवसर उनके लिए कितना श्रेयस्कर होगा यह अभी से कौन कह सकता है। इतना जरूर है कि भारत सरकार छत्तीसग़ढ और दूसरे सात आठ राज्यों में बिखरे माओवादियों के जहरीले जाल को तोड़ने में मदद पाने की उम्मीद कर सकते हैं। आखिर वामपंथी दलों भी कह ही दिया है कि भारत के माओवादियों को नेपाल से प्रेरणा लेनी चाहिए।

बेहतर तो यह होता कि रमन सिंह नेपाल के शासक बनने जा रहे कामरेड प्रचंड को छत्तीसग़ढ आने का आमंत्रण भेजते और उन्ही से यह कहलवाते की छत्तीसग़ढ में मौजूद माओवादी गोलियों की बजाए वोटों का रास्ता चुनें और चूंकि चुनाव इस राज्य में होने ही वाले हैं। इसलिए यह विकल्प शायद उनकी समझ में आ भी जाता। यह जब होगा तब होगा और अगर कामरेड प्रचंड चाहेंगे तभी होगा। तब तक सल्वा जोडुम एक मात्र ऐसा विकल्प है जो माओवादियों की संगठित हिंसा के खिलाफ विकल्प देता है और असहाय नागरिकों को सहायता का आश्वासन भी देता है।

अपने देश में कभी हिंसा से सामाजिक या राजनैतिक परिवर्तन संभव नहीं हुए और यह बात खुद महान ांतिकारी सरदार भगत सिंह भी अपनी डायरी में मंजूर कर चुके हैं। माओवाद के नाम से हिंसा का जो नंगा नाच चल रहा है उससे सुलझने के लिए सल्वा जोडुम के अलावा अगर दूसरा कोई विकल्प दिखता हो तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए मगर सर्वोदय के बाद पहली बार अगर समाज मेंं हिंसा से मुक्ति के लिए सल्वा जोडुम के बहाने ही कोई रास्ता निकला है तो उसे सिर्फ इसलिए खारिज नहीं कर देना चाहिए क्योंकि किसी जज साहब को यह तरीका पसंद नहीं है। सिंध्दातों की लडाई सिध्दांतों से लडी जाती है और और बंदूक के जवाब में बंदूक ही चलाई जाती है। नागरिक मरें तो वह कानून है और मारें तो गुनाह, यह किसी न्यायशास्त्रों में होता हो तो हो लेकिन अपनी समझ में नहीं आने वाला। (शब्दार्थ)

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