आलोक तोमर को लोग जानते भी हैं और नहीं भी जानते. उनके वारे में वहुत सारे किस्से कहे जाते हैं, ज्यादातर सच और मामूली और कुछ कल्पित और खतरनाक. दो बार तिहाड़ जेल और कई बार विदेश हो आए आलोक तोमर ने भारत में काश्मीर से ले कर कालाहांडी के सच बता कर लोगों को स्तब्ध भी किया है तो दिल्ली के एक पुलिस अफसर से पंजा भिडा कर जेल भी गए हैं. वे दाऊद इब्राहीम से भी मिले हैं और रजनीश से भी. वे टी वी, अखबार, और इंटरनेट की पत्रकारिता करते हैं.

Sunday, March 9, 2008

दलाली में नंदा अंदर, जॉर्ज-जया का इंतजार




Dateline India News Service, 9th March, 2008
दलाली में नंदा अंदर, जॉर्ज-जया का इंतजार
डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 9 मार्च
-भारतीय नौसेना के अध्यक्ष एडमिरल सुशील कुमार नंदा को उनके रुतबे के हिसाब से दिल्ली पुलिस का गार्ड मिला हुआ है। वे नियमित जिमखाना क्लब जाते हैं और पुराने रईसों के इलाके गॉल्फ लिंक्स में रहते हैं। देर रात जब सीबीआई उनके बेटे सुरेश और पोते संजीव को पकड़ने आई तो पूरा मोहल्ला जाग गया, मगर एडमिरल साहब वीकेंड की पार्टी से लौटे थे और कुछ जाम के बाद की शानदार नींद में सोते रहे।

उन्हें तड़के फोन पर किसी ने बताया तो टीवी पर उन्होंने खबर देखी। उनके हाथ में कुछ है भी नहीं क्योंकि देश के एक सबसे बड़े रक्षा घोटाले में उनके बेटे और पोते का नाम है और ये दोनों ही नहीं बता पाए हैं कि उनके खातों में अचानक तीन दिन के भीतर चालीस लाख डॉलर की रकम कैसे जमा हो गई और फिर अचानक लंदन के एक खाते में कैसे चली गई? पड़ोसियों का कहना है कि पिता और भाई की बदनामी अखबारों में पढ़ कर कनाडा के वैंक्यूवर शहर में रहने वाली उनकी बेटी मंजीत ने अपने रेस्टोरेंट में आग लगा दी थी और खुद नदी में कूद कर जान दे दी थी। इसके बाद से ही एडमिरल नंदा गहरे अवसाद में चले गए हैं। संजीव नंदा तो कुख्यात बीएमडब्लू मामले में सात लोगों को कुचल देने के मुख्य अभियुक्त हैं और उन्हें बड़ी मुश्किल से तीन साल तिहाड़ जेल में रहने के बाद 75 लाख रुपए का मुचलका भरने पर जमानत मिली थी।

बराक मिसाइलों की दलाली में अब साफ हो गया है कि पूछताछ तो एडमिरल नंदा से भी होगी क्योंकि ये मिसाइलें नौ सेना के लिए ही खरीदी गई थीं और एडमिरल के संपर्कों का इस खरीद में भरपूर इस्तेमाल किया गया है। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने डीआरडीओ के अध्यक्ष के तौर पर इस खरीद का विरोध किया था, लेकिन एक स्टिंग ऑपरेशन से इस दलाली में अपने आप को ईमानदारी की प्रतिमा कहने वाले जॉर्ज फर्नांडीज भी फंस गए हैं और उनकी सहेली जया जेटली भी। एक जमाने में हीरो माने जाने वाले जॉर्ज के राजनीति में अब बहुत प्रशंसक नहीं रहे, लेकिन अब उनकी हरकतों से नाराज उनके पुराने साथी भी उस दिन का इंतजार कर रहे हैं, जब जॉर्ज और जया को भी सीबीआई ऐसे ही किसी रात उठा ले जाएगी।

एडमिरल नंदा को भी अब कौन बचाएगा?
डेटलाइन इंडिया

नई दिल्ली, 9 मार्च-बराक मिसाइल दलाली में चार सौ करोड़ रुपए कमाने के आरोप में भूतपूर्व नौ सेना अध्यक्ष एडमिरल सुशील कुमार नंदा के बेटे सुरेश और संजीव की गिर¬फ्तारी मात्र संयोग नहीं है।

आयकर विभाग नंदा परिवार के खातों की लगातार जांच कर रहा था और इसी सिलसिले में उनके चार्टड अकाउंटेंट विपिन शाह आयकर के एक अधिकारी को मोटी घूस खिलाई। अब शाह भी अंदर हैं और अधिकारी अधिकारी आशुतोष कुमार भी। हालांकि सीबीआई अभी तक की जांच में बराक घोटाले से एडमिरल नंदा का नाम सीधे नहीं जोड़ पाई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बुजुर्ग नंदा हथकड़ियों से बहुत दूर हैं।

नंदा सीनियर पर भी रूस से लड़ाकू पनडुब्बी जहाज एडमिरल गोर्शकोव की खरीद में भी तगड़ी दलाली खाने का आरोप है और वे अपनी संपत्तियों का स्रोत भी अभी तक नहीं बता पाए हैं। एडमिरल नंदा के पिता एक मामूली सरकारी कर्मचारी थे और नौसेना अध्यक्ष की पगार अगर पूरी भी जोड़ ली जाए और उस पर ब्याज भी लगा लिया जाए, तो सिर्फ एक संपत्ति का हिसाब भी पूरा नहीं होता। उनके नाम दिल्ली का शानदार पांच सितारा होटल क्लेरिजिज है, जिसे संयोग से उन्होंने दिवंगत माधव राव सिंधिया द्वारा नियंत्रित एक न्यास से खरीदा था। मुंबई में पांच सितारा होटल सी-रॉक के मालिक भी वे ही हैं और फरीदाबादा में उनका एक पांच सितारा होटल बन चुका है और शुरू ही होने वाला है। इसके अलावा मुंबई के पास स्पेशल इकॉनोमिक जोन बनाने के लिए नंदा परिवार ने बहुत बड़ा निवेश किया है।

गॉल्फ लिंक्स का उनका मकान बाजार भाव से कम-से-कम दस करोड़ रुपए का है, लेकिन संपत्ति के कागजों में उसकी कीमत मात्र आठ लाख रुपए दिखाई जाती है। एक मर्सडीज और एक वैंटले कार उनकी संपत्तियों में दर्ज है और किसी को भी आश्चर्य हो सकता है किस परोपकारी ने उन्हें नई मर्सडीज पैंतीस हजार रुपए में बेच दी। सी क्लास मॉडल की जो मर्सडीज उनके पास है, उसका बाजार भाव आज से एक साल पहले भी 1 करोड़, 75 लाख था। वैंटले तो उन्हें लगभग खैरात में मिल गई लगती है। इस कार का दाम घोषित संपत्ति दस्तावेजों में बारह हजार रुपए बताया गया है, जबकि इसका सबसे सस्ता मॉडल चालीस लाख रुपए का आता है।

अभी तो नंदा परिवार को उस 75 लाख रुपए का हिसाब भी देना है, जो उन्होंने अदालत में संजीव नंदा को बीएमडब्लू मामले में जमानत के लिए खर्च किए थे। इसके अलावा उनके वकील आर के आनंद एक बार अदालत जाने के लिए दो लाख रुपए की फीस लेने वाले वकील हैं और कानूनी खर्चों के तौर पर नंदा परिवार इस मामले में तीन करोड़ रुपए खर्च कर चुका है। इसमें वह रकम शामिल नहीं है, जो कार से कुचल कर मारे गए लोगों के परिवारों को खामोश रहने के बदले दी गई।

जाति युध्द को झेल रहे हैं सुरेश पचौरी
डेटलाइन इंडिया
भोपाल, 9 मार्च-
मध्य प्रदेश कांग्रेस में जाति युध्द छिड़ गया है और इसके शिकार पार्टी के नए प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचौरी तो होंगे ही, अगले चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन पर भी इसका बुरा असर पड़ सकता है।

पचौरी को प्रदेश अध्यक्ष बना कर कांग्रेस ने ब्राह्मण वोटों पर कब्जा करने की अच्छी-खासी कोशिश की है। इसके अलावा अजय सिंह उर्फ राहुल भैया को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बना कर राजपूत वोटों पर भी निशाना साधा है। इस चक्कर में पिछड़ी जातियों के वोट उन्हें याद ही नहीं रहे। पिछले कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष यादव जैसा कि नाम से ही जाहिर है, पिछड़ी जाति के हैं और उन्हें हटाए जाने से संदेश गलत गया है।

इतना ही नहीं, सुभाष यादव ने अपनी कार्यकारिणी में जिन दीपचंद्र यादव को महासचिव बनाया था, वे इस बात पर अड़े हुए हैं कि जब तक नई कार्यकारिणी नहीं बन जाती, तब तक किसी भी कांग्रेस नेता को कारण बताओ नोटिस जारी करने का अधिकार उनका है। सुरेश पचौरी यह मानने को तैयार नहीं हैं और इसी बात को ले कर दीपचंद यादव जैसे गुमनाम नेता के नाम पर तलवारें खिंच गई हैं। सुरेश पचौरी एक जमाने में अर्जुन सिंह के शिष्य थे, लेकिन अर्जुन सिंह के ही दूसरे शिष्य दिग्विजय सिंह और खुद अर्जुन सिंह को आज कल पचौरी पसंद नहीं आते। उनका साथ देने वाले सिर्फ कमलनाथ हैं, लेकिन महाकौशल के बाहर कमलनाथ का राजनैतिक प्रभाव भी ज्यादा नहीं है।

पचौरी एक बार और सिर्फ एक बार भोपाल से लोक सभा चुनाव लड़ चुके हैं और मुस्लिमों की अच्छी-खासी आबादी वाले इस चुनाव क्षेत्र में उन्हें करारी हार मिली थी। इसके बाद उन्होंने कभी राज्य सभा के अलावा दूसरा रास्ता चुना ही नहीं। दिग्विजय सिंह से इन दिनों अर्जुन सिंह के रिश्ते भी बहुत मधुर नहीं चल रहे हैं, लेकिन पचौरी को निपटाने के लिए दोनों एक हो गए हैं। अर्जुन सिंह का इरादा अपने बेटे को प्रदेश अध्यक्ष बनवाने का था क्योंकि प्रतिपक्ष का नेता वे उन्हें बनवा नहीं पाए थे। वोटों की राजनीति में कच्चे पचौरी अब अपनी नई टीम बनाने का इरादा तो कर रहे हैं, लेकिन प्रदेश कांग्रेस के महारथियों के इतने सारे दबाव उन पर है कि वे अब तक टीम के सदस्यों का चुनाव ही नहीं कर पाए हैं।

कश्मीर सिंह की किस्मत मेजर से अच्छी
डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 9 मार्च-
पाकिस्तान की जेल में पैंतीस साल काट कर लौटे कश्मीर सिंह का इल्जाम वाजिब है कि जिस गुप्तचर एजेंसी ने उसे पाकिस्तान भेजा था, उसने न उसकी खोज-खबर ली और न उसके परिवार वालों की। लेकिन खुद सेना गुप्तचर शाखा के एक मेजर की दर्दनाक कहानी सुन कर कश्मीर सिंह का दर्द भी कम हो जाएगा और हमारा, आपका बढ़ जाएगा।

सेना गुप्तचर शाखा के मेजर सुधनीत सिंह वालिया पिछले सोलह साल से गायब हैं। पहले तो परिवार वाले सेना भवन के चक्कर काटते-काटते थक गए, मगर फिर उन्होंने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में अपील की। उच्च न्यायालय दो बार पूछ चुका है और सीबीआई और रॉ दोनों दो बार अदालत से कह चुकी हैं कि उन्हें कुछ पता नहीं।

भारतीय गुप्तचर एजेंसियां अपने जासूसों और जान पर खेल कर देश की रखवाली करने वालों के साथ क्या सुलूक करती है, इसकी एक मिसाल मेजर वालिया का किस्सा है। मेजर वालिया के परिवार वाले चिट्ठियां लिखते रहते हैं और उनका जवाब नहीं आता। 26 मई, 1992 को मेजर वालिया ने अपने परिवार से कहा था कि वे एक सरकारी यात्रा पर बैंकॉक जा रहे हैं। 28 मई, 1992 को उन्हें सरकारी रिकॉर्ड अनुसार सेना के अधिकारियों से जरूरी दस्तावेज और सामान लेना
था। अधिकारी कहते हैं कि मेजर वालिया कभी आए ही नहीं और मेजर वालिया के पिता डॉक्टर तरलोचन सिंह कहते हैं कि उन्होंने छावनी से उन्हें फोन किया। पिता जी गुरदासपुर के बटाला कस्बे में अपने बेटे का अंतहीन इंतजार कर रहे हैं।

मेजर वालिया के पिता डॉक्टर सिंह ने कहा है कि उनके बेटे ने उनसे कहा था कि कभी कोई खबर हो, तो कर्नल एस टी मणिमाला से संपर्क कर लेना। एक-दो बार जब संपर्क किया गया, तो कर्नल ने दिलासा दिया कि जल्दी उनका बेटा लौट आएगा, लेकिन बाद में तो वे इस बात से ही इनकार करने लगे कि वे किसी मेजर वालिया को जानते नहीं हैं। कर्नल मणिमाला अब रिटायर हो चुके हैं और उन्हें लगातार पेंशन भेजने वाले सेना मुख्यालय को भी पता नहीं है कि वे रहते कहां हैं? जाहिर है कि वे बताना नहीं चाहते।

डॉ तरलोचन सिंह बेटे के लिए हर नए प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखते रहते हैं और उस जवाब का इंतजार करते रहते हैं, जो कभी नहीं आने वाला। उच्च न्यायालय ने पिता की याचना पर आदेश दिया था कि मेजर वालिया के अपहरण की रपट लिखी जाए, जो उनके गायब होने के सात साल बाद 19 फरवरी, 1999 को लिखी गई। मामला बाद में सीबीआई को दे दिया गया और अब सीबीआई के अधिकारी भी खाली बैठे हैं। सीबीआई प्रमुख विजय शंकर कहते हैं कि सेना के लोग हमें सिविलयन मानते हैं और पूरा सहयोग नहीं करते। क्या पता मेजर वालिया पाकिस्तान की किसी जेल की काल कोठरी में बूढ़े हो रहे हों और उनका नाम भी बदल कर सुधनीत से सुलेमान कर दिया गया हो या यात्नाओं के कारण उनकी मौत हो गई हो। मगर परिवार को कुछ तो पता चले।

बिहार शैली में चल रहा है कर्नाटक राजभवन
डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 9 मार्च-
रामेश्वर ठाकुर हालांकि कर्नाटक के राज्यपाल हैं, मगर उनकी शैली आजकल बिल्कुल मुख्यमंत्री वाली हो गई है। रामेश्वर ठाकुर पर आरोप है कि उन्होंने बिना किसी ठोस वजह के राज्य के मुख्य सचिव पद प्रह्लाद बिंदुराव महिषी के स्थान पर सुधाकर राव को बिठा दिया है। खास बात यह है कि सुधाकर राव चीन में भारत की राजदूत निरुपमा राव के पति हैं और निरुपमा राव की पहुंच सीधे 10, जनपथ तक बताई जाती है।

इस हिसाब से यह माना जा रहा है कि रामेश्वर ठाकुर ने दिल्ली से मिली हिदायत के बाद सुधाकर राव को मुख्य सचिव बनाया है। रामेश्वर ठाकुर पर यह आरोप भी लगे हैं कि उन्हाेंने बिंदुराव को तो हटा दिया, मगरा वे उन आईएएस और आईपीएस अफसरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं, जो अपने पद का जम कर दुरुपयोग कर रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि सुधाकर राव के जितने अच्छे संपर्क कांग्रेस में हैं, उतने ही अच्छे उनके कर्नाटक के भूतपूर्व मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी के साथ भी अच्छे संबंध रहे हैं। कुमारस्वामी की सरकार के समय वे राज्य के प्रधान सचिव थे। मजे की बात यह है कि राज्य में राव से भी सीनियर अफसर हैं मगर राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर ने उनको नजरअंदाज करके राव को मुख्य सचिव बना दिया है। यह बात अलग है कि राव के सीनियर दिलीप राऊ ने केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल को शिकायत करके राव की नियुक्ति पर सवाल उठाया है।

रामेश्वर ठाकुर पर तब भी उंगलियां उठी थीं, जब भाजपा और जनता दल यूनाइटेड के झगड़े के सुलझ जाने के बाद भाजपा ने सरकार बनाने का दावा पेश किया था, मगर रामेश्वर ठाकुर ने भाजपा को सरकार बनाने का न्योता देने में बहुत देर की थी। तब कहा गया था कि वे इसीलिए भाजपा को सरकार बनाने का न्योता नहीं दे रहे हैं क्योंकि उन्हें 10, जनपथ की तरफ से निर्देश नहीं मिला है। हालांकि राजभवन ने इस आरोप को तब भी गलत बताया था।

कल्याण ने राजनाथ को डांटा-''भाषण बंद करो''
डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 9 मार्च-
उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने अपने जूनियर रहे और अब भाजपा के अध्यक्ष राजनाथ सिंह से साफ कह दिया है कि सिर्फ भाषणबाजी से वे भाजपा को सत्ता में नहीं ला सकते। कल्याण्ा ने अपने चुनावी समीकरण पेश करते हुए कहा कि अगर भाजपा को केंद्र में अपनी सरकार बनाती है तो उसे उत्तर प्र्रदेश में कम-से-कम 35 लोकसभा सीटें चाहिए और इसके लिए कम-से-कम 250 किलो खून बहाना पड़ेगा।

यहां यह याद किया जा सकता है कि कल्याण सिंह जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तो राजनाथ सिंह उनकी सरकार में शिक्षा मंत्री थे। उन्होंने भाजपा अध्यक्ष को याद दिलाया है कि पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी उत्तर प्रदेश के 38 जिलों में एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। कल्याण ने राजनाथ की खिंचाई करते हुए कहा कि अध्यक्ष जी सिर्फ भाषणबाजी से कुछ नहीं होगा, आप गांव-गांव जा कर चौपाल लगाइए, संघर्ष करिए और जेल भरिए, तभी पार्टी का भला होगा।

कल्याण सिंह का कहना है कि भाजपा को दिल्ली में सरकार बनाने के लिए कम-से-कम 165 सांसद चाहिए और इस आंकड़े तक पहुंचने के लिए पार्टी को 35 सांसद उत्तर प्रदेश से चाहिए। उत्तर प्रदेश में कुल अस्सी सीटें हैं और कल्याण के समीकरण के हिसाब से भाजपा को लगभग आधी सीटें अपने कब्जे में करनी पड़ेगी। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहने वाले एक भाजपा नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि कल्याण सिंह भी शायद आज कल शेखचिल्ली की तरह सपने देखने लगे हैं क्योंकि पैंतीस सीटें जीतने की हालत में भाजपा दूर-दूर तक नहीं दिखती। इस नेता के अनुसार पार्टी उत्तर प्रदेश में अगर पच्चीस सीटें भी जीत गई, तो यह भी उसकी एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।

राजनाथ सिंह जब भाजपा अध्यक्ष बने थे, तब उन्हें बहुत सारी मुसीबतें झेलनी पड़ी थीं मगर पंजाब, उत्तराखंड, गुजरात और हिमाचल जीतने के बाद उन्होंने किसी तरह अपनी कुर्सी बचा ली। लेकिन उनकी असली परीक्षा लोकसभा चुनाव में खास तौर पर उत्तर प्रदेश में होगी क्योंकि उत्तर प्रदेश उनका अपना राज्य है और भाजपा को केंद्र में अपनी सरकार बनाने के लिए उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा सीटें चाहिए।

प्रेम की डोरी से बंधे इरफान पठान
डेटलाइन इंडिया
वडोदरा, 9 मार्च-
टीम इंडिया से बाहर हो जाने के इरफान पठान जनवरी की सर्द सुबह में रिलायंस स्टेडियम में सुबह-सुबह प्रेक्टिस करने पहुंच जाते थे और बाउंड्री के किनारे बैठकर एक लड़की हमेशा उनका हौंसला बढ़ाया करती थी। पता चला है कि पठान को शिवांगी नाम की इस लड़की से प्रेम हो गया है और ये दोनों आस्टे्रलिया में छुट्टियां मना रहे हैं।

पठान टीम इंडिया के साथ आस्टे्रलिया में मिली ऐतिहासिक जीत का जश्न मनाने भारत नहीं पहुंचे थे और इसकी वजह उनका प्रेम ही बताया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक शिवांगी एक भारतीय राजनयिक की बेटी हैं और उनके पिता आस्टे्रलिया की राजधानी कैनबरा में रहते हैं। शिवांगी का भारत और आस्टे्रलिया के बीच आना-जाना लगा रहता है।

वैसे पठान की बहत शगुफ्ता इस बात को गलत बता रही हैं कि उनका भाई अपनी प्रेमिका के साथ छुट्टियां मनाने के लिए आस्टे्रलिया में रुका है। उनके अनुसार पठान वहां अपने एक बीमार रिश्तेदार से मिलने के लिए रुके हैं, लेकिन पठान के दोस्त इसे गलत बता रहे हैं। बीसीसीआई सूत्रों के अनुसार पठान ने बोर्ड अधिकारियों से पहले ही आस्टे्रलिया में रुकने की इजाजत ले ली थी। बीसीसीआई के एक अधिकारी के अनुसार पठान ने बोर्ड को कहा था कि आस्टे्रलिया में उन्हें एक निजी काम निपटाना है।

शिवांगी के बारे में बताया जाता है कि वे पठान की तब से फैन है, जब उन्होेंने पाकिस्तान के खिलाफ शानदार गेंदबाजी करके पाकिस्तान को उसी की धरती में पीटने में बहुत अहम भूमिका निभाई थी। पठान के एक दोस्त तो यह भी दावा करते हैं कि इरफान शिवांगी को अपने माता-पिता और परिवार के बाद अपनी सबसे बड़ी प्रेरणास्रोत मानते हैं और पठान को जब टीम इंडिया से काफी समय के लिए निकाल दिया गया था, तब शिवांगी हमेशा उनका हौसला बढ़ाते हुए कहती थी कि वे टीम में बहुत जल्द ही वापसी करेंगे। पठान ने टीम में वापसी भी की और वे तब से लगातार टीम में बने हुए हैं। हालांकि त्रिकोणीय श्रृंखला में उनकी गेंदबाजी इतनी अच्छी नहीं रही, फिर भी उन्होंने अपने आलराउंडर खेल से सभी को प्रभावित किया है।

'ग' से गोविंदा, 'ग' से गैर हाजिर
डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, मुंबई, 9 मार्च-
अभिनेता से नेता बने गोविंदा नेतागीरी में भले ही अपने आप को साबित न कर पाए हों, फिर भी उन्होंने राजनीति में एक खास रिकॉर्ड बना डाला है। गोविंदा लोकसभा में सबसे ज्यादा अनुपस्थित रहने वाले सांसद का रिकॉर्ड बना दिया है।

वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इस बार का जब बजट लोकसभा में पेश किया था, तब भी गोविंदा संसद से गायब थे, जबकि तब लगभग सभी सांसद वहां मौजूद थे। संसद के पिछले सत्रह सत्रों में में गोविंदा संसद से सबसे ज्यादा गायब रहने वाले रहे संसद सदस्य साबित हुए हैं। आंकड़े बताते हैं कि गोविंदा की संसद में उपस्थिति मुश्किल से चार प्रतिशत रही है, जो जाहिर तौर पर शर्मनाक है। गोविंदा को तो उनके संसदीय क्षेत्र उत्तर मुंबई के लोग भी तब से खोज रहे हैं, जब वे वहां से सांसद बने हैं। गोविंदा ने अपने चुनाव प्रचार में फिल्मी अंदाज में बड़े-बड़े वायदे किए थे, मगर हालत यह है कि उनके संसदीय क्षेत्र के लोग उन्हें सिर्फ टीवी पर किसी टीवी शो में या इंटरव्यू देते हुए या फिर फिल्मों में लटके-झटके हुए लगाते हुए ही देख सकते हैं।

2005 में गोविंदा संसद के 85 में से पंद्रह सत्रों में उपस्थित रहे थे, यानी तब उनकी हाजिरी लगभग सत्रह प्रतिशत रही थी। लेकिन उन्होंने अपनी उपस्थिति बढ़ाने की बजाय और कम कर दी और 2006 में वे संसद के 77 में से सिर्फ सात सत्रों में उपस्थित रहे। 2007 में तो गोविंदा ने सारी हदें ही पार कर दीं और वे संसद के 66 में से सिर्फ 2 ही सत्रों में देखे गए। गोविंदा से पहले उत्तर मुंबई से सांसद रहने वाले राम नाईक ने गोविंदा के इस रिकॉर्ड के लिए उनकी जमकर खिंचाई की है। नाईक ने कहा कि उत्तर मुंबई के लोगों को अब उन्हें हराकर पछतावा हो रहा है और उन्हें समझ आ गया है कि उन्होंने गोविंदा को अपना सांसद बना कर कितना गलत किया है। नाईक का कहना है कि अब केंद्र सरकार को फैसला करना है कि वह गोविंदा का क्या करती है क्योंकि लोग और संसद तो उन्हें बुरी तरह तंग हो चुके हैं।

सितारों ने पूछा-हम आपके हैं कौन?
डेटलाइन इंडिया
मुंबई, 9 मार्च-
मुंबई में उत्तर भारतीयों के खिलाफ अभियान चलाने वाले राज ठाकरे को सलमान खान, सुनील शेट्टी और नाना पाटेकर ने झटका दे दिया है। सुनील शेट्टी का कहना है कि उनका परिवार तो खुद कर्नाटक से आ कर मुंबई में बसा है तो वे राज ठाकरे के इस अभियान का समर्थन कैसे कर सकते हैं।

हाल में ही सलमान खान, सुनील शेट्टी और नाना पाटेकर ने राज ठाकरे के इस अभियान का समर्थन करते हुए उन्हें पत्र सौंपा था, मगर अब ये तीनों ही एक्टर पलट गए हैं। सलमान का कहना है कि वे ऐसे किसी अभियान का समर्थन नहीं कर सकते, जिसका उद्देश्य देश को बांटना हो। एक सप्ताह पहले ही सलमान खान के कथाकार पिता सलीम खान ने राज ठाकरे को एक पत्र भेजा था, जिसमें उनके इस अभियान का समर्थन किया गया था और इसमें सलमान के अलावा उनके भाई अरबाज के भी दस्तखत थे।

सलमान भी सुनील शेट्टी की तरह कह रहे हैं कि वे तो खुद विस्थापित है तो वे दूसरे विस्थापितों की खिलाफत कैसे कर सकते हैं। सलमान ने याद दिलाया कि उनके पिता सलीम खान खुद मध्य प्रदेश के इंदौर से आकर मुंबई में बसे थे और उनकी मां जम्मू की है। उनका कहना है कि उनका परिवार एक धर्मनिरपेक्ष परिवार है और उनका हर संप्रदाय और धर्म में उतना ही भरोसा और आस्था है।

मनोज वाजपेयी के नाम से शिव सेना के मुखपत्र सामना में उत्तर भारतीयों और बिहारियों का विरोध किया गया था। मगर वाजपेयी का भी यही कहना है कि वे उत्तर भारतीयों और बिहारियों के खिलाफ नहीं है, वे तो खुद बिहार के मोतीहारी के हैं और उनके नाम से गलत बयान दिया गया है। नाना पाटेकर तो राज का समर्थन करके इतने पछता रहे हैं कि उनकी इस मामले में बिहारी मूल के फिल्म निर्देशक प्रकाश झा से ठन गई है। नाना ने कहा कि कल तक उनके और प्रकाश के बीच बहुत अच्छे संबंध थे, मगर राज का साथ देने पर दोनों के बीच में दरार आ गई है और वे राज का समर्थन नहीं करेंगे।

सीबीआई मुख्यालय पर लश्कर की नजर
डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 9 मार्च-
संसद पर हमले के बाद लश्कर-ए-तैयबा ने दिल्ली की सबसे महत्वपूर्ण इमारतों पर हमला करने का जो सिलसिला शुरू किया था, अब लश्कर उसे आगे बढ़ाने की तैयारी में हे। लश्कर ने दिल्ली के स्थित सीबीआई मुख्यालय, आईआईटी, मुंबई स्थित नेशनल स्टॉक एक्सचेंज, मुंबई स्टॉक एक्सचेंज तथा परमाणु ऊर्जा संयंत्र को उड़ाने की खौफनाक साजिश रची है।

इन महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों के डाटा सीडी और फ्लॉपी में डालकर लश्कर के कमांडरों को भेजा जा चुका है और हमले के लिए मोडयूल्स तैयार कर लिये गये हैं। इस आशय की जानकारी मिलने के बाद खुफिया व सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ गई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने महाराष्ट्र और दिल्ली पुलिस को सतर्क रहने के निर्देश दिये हैं।

लश्कर-ए-तैयबा एक बार फिर तबाही मचाने की फिराक में है। सीआरपीएफ ग्रुप सेंटर रामपुर पर हुए हमले के सिलसिले में पकड़े गये आतंकवादी सबाहुद््दीन अहमद व फहीम अरशद ने पूछताछ के दौरान जो जानकारी दी है उससे सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ गई है। उन्होंने बताया है कि लश्कर के कमांडरों की नजर भारत के महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर हैं। इनके बारे में पूरी जानकारी व डाटा सीडी में एकत्र कर कमांडरों को भेजी जा चुकी है। इन पर फिदाईन हमले के लिए मोडयूल्स भी तैयार कर लिये गये हैं। इस जानकारी के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय के निदेशक आंतरिक सुरक्षा ने 28 फरवरी को महाराष्ट्र, दिल्ली के गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक व पुलिस आयुक्त को पत्रांक 1-11034/2/2008आईएसअ-आईवी के जरिये पत्र भेजा और उनसे खुफिया जानकारी जुटाने, अत्यधिक चौकस रहने तथा पुख्ता सुरक्षा इंतजाम करने को कहा है।

आतंकवादी संगठन ने फिदाईन हमले के लिए जिन पांच महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों को चुना है वे, सुरक्षा व अर्थव्यवस्था के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हैं। साजिश सुनियोजित है और फ्लॉपी में एक-एक चीज की जानकारी है इसलिए दिल्ली पुलिस के हाथ-पांव फूले हुए हैं। दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत ने बताया कि पुलिस को आईआईटी पर हमले की साजिश के बार में पता चला है और दिल्ली पुलिस पूरी तरह चौकस है।

भूख के बीच रामधुन सुनी राजकुमार ने
डेटलाइन इंडिया
गुणपुर (उड़ीसा), 9 मार्च
-कालाहांडी की भूख और अकाल कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी को प्रभावित भले ही नहीं कर पाए, मगर जिस मंच से उनके पिता राजीव गांधी ने अपने जीवन का आखिरी भाषण दिया था, वहां पहुंच कर भावुक जरूर हो गए। उधर आज कल ढोल कलाकार के तौर पर मशहूर उड़ीसा के भूतपूर्व मुख्यमंत्री गिरधर गमांग तो बाकायदा रो ही पड़े। यह बात अलग है कि वे अपनी वर्तमान राजनैतिक दुर्दशा पर रो रहे थे या राजीव गांधी की याद में, यह कोई नहीं जानता।

इसी गुणपुर से राजीव गांधी ने चेन्नई की उड़ान भरी थी और वहां से श्रीपेरंबदूर पहुंचे थे, जहां से वे कभी नहीं लौटे। इस संयोग को महिमा देने के लिए पूरा माहौल बनाया गया था। चबूतरे पर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तस्वीर लगी थी। बापू के पसंदीदा भजन रघुपति राघव राजाराम की धुन बज रही थी। राजीव गांधी अमर रहें और राहुल गांधी जिंदाबाद के नारे से फिजा गूंज रही थी। माहौल भावुक था। युवराज ने अपने आंसू रोक लिए थे।ं। कांग्रेस के युवराज भावनात्मक रूप से भीड़ को जोड़ने की कोशिश करते हैं। वह कहते हैं, आपकी सोच मेरे पिता के लिए बहुत जरूरी थी। इसलिए, आखिरी मुलाकात आपके साथ हुई। एक बार फिर तालियां बजती हैं और लोगों को राहुल गांधी के चेहरे में राजीव गांधी नजर आने लगते हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 17 साल पहले श्रीपेरंबदूर जाने से पहले अंतिम जनसभा को संबोधित किया था। कई लोगों के जेहन में आज भी वह लमहा याद है। राहुल उसी तस्वीर को दोबारा उभारने की कोशिश करते हैं। वह कहते हैं, राजीव गांधी ने युवाओं को बल दिया। उनकी हत्या युवाओं की आवाज की हत्या थी। माहौल तैयार हो चुका था। इसलिए, आगे बढ़ते हुए पार्टी महासचिव ने कहा कि किसी भी बदलाव के लिए राजनीति सबसे ज्यादा असरदार है। कांग्रेस सहित तमाम सियासी पार्टियों ने युवाओं के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए हैं। वह युवाओं को उनकी राजनीतिक जगह दिलाएंगे।

यह क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ माना जाता है। गिरधर गमांग इस क्षेत्र से नौ वींबार जीतकर संसद में पहुंचे हैं। पर इस बार राजनीति बदल रही है। गमांग की पत्नी हेमा गमांग खुद उनके लिए मुश्किल पैदा कर रही हैं। आपसी झगड़े की वजह से राहुल गांधी इस स्थान पर राजीव गांधी के नाम से कंप्यूटर सेंटर का शिलान्यास नहीं कर पाए। उस मंच को जिस पर राजीव गांधी की याद में तस्वीर लगाई गई थी। वह भी तीन दिन पहले दोबारा तैयार किया गया था।

भारत दौरे पर निकले राहुल गांधी को उड़ीसा में नए भारत की तस्वीर दिखी। उत्तर प्रदेश से तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि यहां पिछड़ापन ज्यादा है। बुनियादी सुविधाओं की कमी है। राहुल गांधी ने जिस अंदाज और जिस माहौल में अपनी बात रखी। उससे साफ है कि लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी कांग्रेस भावनात्मक रिश्ते को भुनाने की पूरी कोशिश करेगी। उड़ीसा में ही पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी आखिरी जनसभा को संबोधित किया था।

यूपी में भाजपा नेताओं का अकाल
डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 9 मार्च-
भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश की जंग अभी से हार गई है। वैसे ही वहां पार्टी के सबसे बड़े नेता कल्याण सिंह और पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की पटरी नहीं बैठती और लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी का कोई भी ढंग का नेता अभियान की जिम्मेदारी लेने को राजी नहीं है। नेताओं की कमी इस कदर है कि चुनाव प्रबंधन में लाजवाब माने वाले प्रमोद महाजन की जगह कर्नाटक के अनंत कुमार को दे दी गई है, जिन्हें कर्नाटक छोड़ कर उन राज्यों में कोई नहीं जानता, जहां चुनाव होने हैं।

भूतपूर्व पार्टी अध्यक्ष वेंकैया नायडू, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह, केशुभाई पटेल आदि का नाम मोर्चा संभालने वालों में नहीं है। असली दारोमदार भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह, उपाध्यक्ष यशवंत सिन्हा, महासचिव अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, अनंत कुमार, रवि शंकर प्रसाद, गोपीनाथ मुंडे, नरेंद्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे और विनय कटियार के कंधे पर होगी। महासचिव अनंत कुमार पहली बार महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे।

तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश में रवि शंकर प्रसाद और यशवंत सिन्हा अपनी भूमिका अदा करेंगे। यहां गठजोड़ से लेकर टिकट और सीटों के बंटवारे में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। अरुण जेटली गत पंद्रह साल के आंकड़ों और चुनावी माहौल के आधार पर रणनीति की समीक्षा करेंगे। मुंडे महाराष्ट्र और सुषमा गठबंधन की गुंजाइश के संदर्भ में अपनी भूमिका निभाएंगी।

खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश का मोर्चा किसे दिया जाए पार्टी यह तय नहीं कर पा रही है। दरअसल, यहां पार्टी का मोर्चा अकेले कोई संभालने को तैयार नहीं है। नेताओं के आपसी अहम उत्तर प्रदेश में आकर सबसे अधिक टकरा रहे हैं। भाजपा शीर्ष नेतृत्व भी यह स्वीकार कर रहा है कि उत्तर प्रदेश में सबको मिल कर प्रयास करना होगा और इसकी कोशिश जारी है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को मोर्चा संभालने की जिम्मेदारी नहीं दिए जाने को जायज ठहराते हुए पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि दिग्गज पूर्व में अपनी भूमिका निभा चुके हैं अब उन्होंने ही मौका युवाओं को दिया है।

बूटा सिंह के प्रिय और निलंबित आईजी
डेटलाइन इंडिया
चंडीगढ़, 9 मार्च-
राजनैतिक निर्वासन से राजभवन के निष्कासन के बाद अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष बनाए गए बूटा सिंह बार-बार अपनी हैसियत साबित करने में लगे हुए हैं। इस बार उन्हें अपने पुराने प्रिय अधिकारी राजिंदर सिंह का मामला मिल गया है। बूटा सिंह जब गृहमंत्री थे, तो राजिंदर सिंह उनके निजी सचिव हुआ करते थे।

आईजी राजिंदर सिंह के निलंबन पर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने पंजाब सरकार से सख्त नाराजगी जताई है। आयोग के चेयरमैन बूटा सिंह ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए कहा कि वे इस मामले में राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव और डीजीपी से जवाब तलब करेंगे।

बूटा सिंह ने कहा कि आईपीएस अधिकारी होने के कारण राजिंदर सिंह को निलंबित करने से पहले राज्य सरकार को केंद्रीय गृह मंत्रालय और यूपीएससी से मंजूरी लेनी चाहिए थी लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया। जिन आरोपों के तहत आईजी को निलंबित किया गया है वह पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में विचाराधीन हैं तो सरकार ऐसा फैसला कैसे ले सकती है। एक झूठी शिकायत लेकर सरकार ने उन्हें निलंबित किया है। यह सरासर ज्यादती है।

पंजाब सरकार ने राजिंदर सिंह को पांच मार्च को निलंबित करने का आदेश जारी किया था। उन पर आरोप लगाया गया है कि वे रोपड़ जिले में भद््दल स्थित आईईटी के प्रबंधन में हस्तक्षेप कर रहे हैं। ऐसी शिकायत मिलने पर राज्य के एडीजीपी (इंटेलिजेंस) शशिकांत की जांच रिपोर्ट के आधार पर राजिंदर सिंह को निलंबित किया गया था। राजिंदर सिंह पठानकोट में आईजी काउंटर इंटेलिजेंस के पद पर तैनात हैं।

सीआरपीएफ की मदद से सेना को ताकत
डेटलाइन इंडिया
श्रीनगर, 9 मार्च-
कश्मीर के लोगों का पहली बार खाकी वर्दी पर कुछ भरोसा जमता नजर आ रहा है। खास तौर पर कश्मीर की अंदरूनी सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाली सीआरपीएफ को कश्मीरियों का सहयोग मिल रहा है और इसका फायदा सीधे तौर पर सेना को भी मिल रहा है।

2008 में अब तक सेना 33 आतंकवादियों को मुठभेड़ में निपटा चुकी है। इनमें 16 विदेशी हैं और इनमें से भी ज्यादातर पाकिस्तानी है।साथ ही 100 के करीब आतंकियों को गिरफ्तार भी किया गया है। यह सफलता लोगों के सहयोग से ही मिली है। यही वजह है कि सेना मंजिल को अब बहुत करीब समझने लगी है।सूरत-ए-हाल यही बयां कर रहे हैं कि सेना लोगों का विश्वास और भरोसा जीत कर मंजिल के बहुत करीब पहुंच गई है। नया साल शुरू होते ही अचानक आतंकवादी कार्रवाई बढ़ गईं। कई इलाकों में रोजाना मुठभेड़ होने लगे। आमतौर पर कश्मीर में जनवरी और फरवरी के दौरान सर्दी और बर्फ होने के कारण आतंकवादी गतिविधियां लगभग ठप-सी हो जाती हैं, लेकिन इस साल दोनों महीनों में सुरक्षा बलों ने कार्रवाई कर 33 आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया है। इनमें 16 विदेशी आतंकी भी शामिल हैं। साथ ही 100 आतंकियों को गिरफ्तार किया गया।

सीआरपीएफ के प्रवक्ता प्रभाकर त्रिपाठी ने बताया कि मारे गए आतंकियों में हिज्ब और अल बदर के कई कमांडर भी शामिल हैं। इस साल जनवरी में पुलिस और फौज ने 13 आतंकियों को मार गिराए, जिनमें आठ विदेशी और पांच स्थानीय आतंकी थे। सुरक्षा बलों ने 70 ट्रेंड आतंकियों को गिरफ्तार भी किया, जिनमें 15 ओवर ग्राउंड वर्कर शामिल हैं। इस महीने चार बम धमाके भी हुए और एक बारूदी सुरंग फटा। आतंकियों ने तीन बार आम आदमी पर भी हमला किया और तीन लोगों की जान ले ली। फायरिंग की 15 घटनाएं सामने आई। पांच बार मुठभेड़ हुए, जिसमें एक एसपीओ और सिपाही जख्मी हुए। सुरक्षा बलों के चार जवान भी इस दौरान घायल हुए।

फरवरी में सुरक्षा बलों ने कार्रवाई करते हुए 20 आतंकियों को मार गिराया, जिनमें 11 विदेशी और 9 स्थानीय शामिल हैं। इस महीने पुलिस ने 34 आतंकियों को गिरफ्तार कर लिया, जिनमें से 12 ओवर ग्राउंड वर्कर भी शामिल हैं। इसके अलावा दस मुठभेड़ हुए, जिसमें फौज के दो जवान शहीद हो गए और तीन जख्मी हुए। घायलों में पुलिस के दो जवान भी शामिल हैं। फरवरी में दो बड़े धमाके हुए। प्रभाकर त्रिपाठी ने बताया कि वर्ष 2007 के पहले दो महीने की अपेक्षा इस साल कहीं ज्यादा सफलता मिली है। इसका सबसे बड़ा कारण रहा लोगों का सकारात्मक सहयोग। नूरपोरा त्राल में हिज्ब का वित्तीय प्रमुख इसलिए मारा जा सका, क्योंकि लोगों ने सेना को सही समय पर पुख्ता सूचना उपलब्ध कराई। वित्तीय प्रमुख इसी इलाके में पिछले 15 सालों से सक्रिय था। जब तक लोग उसके साथ रहे वह सुरक्षित रहा, लोगों ने सेना को साथ देना उचित समझा, वह ढेर हो गया।

हमारे पास यूरेनियम है, इरादा नहीं
डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 9 मार्च
-मनमोहन सिंह सरकार यूरेनियम पाने के लिए अमेरिका से समझौता करके अपनी बलि देने पर तुली हुई है मगर उसी के यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने साफ शब्दों में कहा है कि भारत में मौजूद यूरेनियम का अगर ठीक से इस्तेमाल किया जाए, तो विदेशों पर हमारी निर्भरता घट सकती है। यूरेनियम भारत में बहुत मौजूद है, लेकिन उसे उपयोग के लायक के बनाने के लिए तकनीकी विकास नहीं किया जा रहा।

भारत में यूरेनियम कॉरपोरेशन की स्थापना की ही इसीलिए गई थी कि उपग्रह छवियों से पता चला था कि इतने बड़े देश में कम-से-कम पचास जगह यूरेनियम के ऐसे भंडार है, जिनका आसानी से इस्तेमाला किया जा सकता है। इनमें से जो तीन भंडार भूमि की सतह के काफी करीब हैं, वहां से स्थानीय निवासियों को हटाने की पहल भी अभी तक नहीं की गई, क्योंकि इसके लिए कभी बजट मंजूर नहीं हुआ। यूरेनियम की खोज और उसके विकास के लिए काफी बड़ा बजट चाहिए, लेकिन कोई भी बजट इतना बड़ा नहीं होता कि देश की इज्जत दांव पर लगाने की नौबत आ जाए।

आज जैसी यूरेनियम की उपलब्धता है और जैसी संभावनाएं हैं, उसे देखते हुए अगले पांच सालों में भारत के पास छह और परमाणु रिएक्टर्स होंगे। यूरेनियम के बढ़ते महत्व को देखते हुए भारत इसके खनन का दायरा लगातार बढ़ा रहा है। इसके पीछे लक्ष्य ऊर्जा में परमाणु ऊर्जा की भागीदारी तीन फीसदी से बढ़ाकर 10 फीसदी करना है। इसी क्रम में छह और परमाणु रिएक्टर्स का निर्माण जारी है और उम्मीद है कि आने वाले पांच सालों में ये काम करना शुरू कर देंगे। ये बातें यूरेनियम कारपोरेशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन कम एमडी रमेंद्र गुप्त ने साझा कीं।

उन्होंने सुरक्षा कारणों से यूरेनियम के सालाना उत्पादन का खुलासा तो नहीं किया लेकिन कहा कि देश में यूरेनियम पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। यहां युनाइटेड कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में भावी इंजीनियर्स को संबोधित करने आए श्री गुप्त ने बताया कि फिलहाल देश में यूरेनियम का प्रमुख खनन झारखंड के खदानों से ही होता है लेकिन भविष्य की जरूरतों को देखते हुए आंध्र प्रदेश, मेघालय, राजस्थान और कर्नाटक में भी खनन और प्रोसेस इकाइयां स्थापित की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि फास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स के तैयार हो जाने पर न केवल सैकड़ों सालों की ऊर्जा समस्या का समाधान ढूंढा जा सकेगा बल्कि थोरियम का इस्तेमाल भी परमाणु ऊर्जा के निर्माण में हो सकेगा।

श्री गुप्त ने साफ किया कि अमेरिका के साथ होने वाले परमाणु समझौते से मौजूदा कार्यक्रमों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। हालांकि उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत जैसे विकासशील देश में बहुविकल्पीय ऊर्जा प्रणाली की जरूरत है। हम अपने सभी संसाधनों को बेहतर ढंग से इस्तेमाल करके ही दूरगामी लक्ष्यों को हासिल कर सकते हैं।

बेटियों की हत्या के मामले में तीर्थ सबसे आगे
डेटलाइन इंडिया
लखनऊ, 9 मार्च-
बनारस में भले ही देवियों की पूजा होती है, मगर देवियां माने जाने वाली बनारस की बेटियों की लगातार गर्भ में हत्या हो रही है। 1991 में बनारस में प्रति एक हजार पुरुषों पर 944 महिलाएं थीं मगर अगली जनगणना में यह आंकड़ा सिर्फ 919 रह गया था और जिस तरह के हालात है, उसमें 2011 में यह आंकड़ा 900 से भी नीचे गिर सकता है।

प्रसव पूर्व निदान तकनीक (पीपीएनडीटी) अधिनियम की खुलेआम धज्ज्ािया उड़ाई जा रही हैं। बिना पंजीकरण के अल्ट्रासाउंड केंद्र चल रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि गुमशुदा लड़कियों की संख्या बढ़ रही है।नगर निगम में दर्ज रिकार्ड को मानें तो उसके मुताबिक वर्ष 2005 में लिंगानुपात 866 तक गिर गया। तीन वर्षों में आंकड़ा 800 से नीचे चला गया है। इस साल निगम में महज 25 हजार 603 बच्चों का ही पंजीकरण किया गया। इसे विश्वसनीय आंकड़ा न मानें तो भी इतना तो अंदाजा लगता ही है कि लिंगानुपात में तेजी से गिरावट आ रही है। बेटियों को दुनिया में आने से रोकना तभी संभव है जब जन्म से पहले पता चले कि कोख में पल रहे बच्चे का लिंग क्या है। लिंग निर्धारण का सबसे प्रमुख साधन अल्ट्रा साउंड है। अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर गर्भवती मां के पहुंचने के बाद ही बेटियां गुम हो जाती हैं। गुमशुदा बालिकाओं का सुराग लगाने के लिए जरूरी है कि अल्ट्रासाउंड केंद्रों के काम करने के तरीके की पड़ताल की जाए।

प्रसव पूर्व निदान, तकनीक अधिनियम के तहत बिना पंजीकरण का कोई भी अल्टासाउंट केंद्र या जेनेटिक क्लीनिक नहीं चलाई जा सकती है। हर पांच साल पर इस पंजीकरण का नवीनीकरण होना चाहिए। ऐसा नहीं करने वालों की मशीन जब्त हो जानी चाहिए। कुछ महीने पहले अधिनियम के तहत बनी समिति ने लंका, सुंदरपुर, भिखारीपुर, महमूरगंज और गुरुधाम में पांच केंद्रों का निरीक्षण किया था। एक केंद्र पर बिना पंजीकरण के मशीन चलती पाई गई। कुछ केंद्रों पर कोई रिकार्ड नहीं था और कुछ में आधा अधूरा रिकार्ड मिला।

इसके बावजूद कमेटी ने सबको रिकार्ड दुरुस्त करने और पंजीकरण कराने का निर्देश देकर छोड़ दिया। जानकारी मुताबिक शहर में कम से कम तीन ऐसे अल्ट्रासाउंड सेंटर हैं जो बिना पंजीकरण के चल हैं। कमेटी के सदस्य डा. संतोष ओझा ने स्वीकार किया कि जिस केंद्र को चेतावनी दी गई थी, उसने अब तक पंजीकरण नहीं कराया। फिर भी मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. हलीम का दावा है कि सभी डायग्नोस्टिक सेंटर पंजीकृत है। उन्होंने इतना जरूर स्वीकार किया कि इस मामले में रिकार्ड नहीं रखे जा रहे हैं। सात साल पहले कमेटी गठित की गई थी लेकिन उसने अधिनियम का अनुपालन कराने का ठोस प्रयास कभी किया ही नहीं। दो-तीन बार छापे मारे भी गए तो उनमें भी अधिनियम की अवहेलना की अनदेखी ही की गई।

2 comments:

Udan Tashtari said...

खबरों का खालिस पिटारा....पढ़ कर तो आनन्द आया..अब देखिये...होता है क्या.

डेटलाइन इंडिया said...

धन्यवाद, भी. समाजवाद के शीग्र पतन की मिस्सल हैं जार्ज --आलोक